श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 35: सीताजी के पूछने पर हनुमान जी का श्रीराम के शारीरिक चिह्नों और गुणों का वर्णन करना तथा नर-वानर की मित्रता का प्रसङ्ग सुनाकर सीताजी के मन में विश्वास उत्पन्न करना  »  श्लोक 25-26h
 
 
श्लोक  5.35.25-26h 
ऋष्यमूकस्य मूले तु बहुपादपसंकुले॥ २५॥
भ्रातुर्भयार्तमासीनं सुग्रीवं प्रियदर्शनम्।
 
 
अनुवाद
‘बहुत से वृक्षों से घिरे हुए ऋष्यमूक पर्वत की तलहटी में दोनों भाइयों की भेंट प्रियदर्शन सुग्रीव से हुई जो अपने भाई से भयभीत होकर बैठा हुआ था। ॥25 1/2॥
 
‘At the base of the Rishyamuka mountain, which is surrounded by many trees, both the brothers met Priyadarshan Sugreeva who was sitting in fear of his brother. ॥ 25 ​​1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)