श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 35: सीताजी के पूछने पर हनुमान जी का श्रीराम के शारीरिक चिह्नों और गुणों का वर्णन करना तथा नर-वानर की मित्रता का प्रसङ्ग सुनाकर सीताजी के मन में विश्वास उत्पन्न करना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  5.35.21 
सत्यधर्मरत: श्रीमान् संग्रहानुग्रहे रत:।
देशकालविभागज्ञ: सर्वलोकप्रियंवद:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
श्री रामचन्द्रजी सत्यधर्म के अनुष्ठान में लगे हुए हैं, ऐश्वर्यवान हैं, न्यायपूर्वक धन संग्रह करने में तत्पर हैं और प्रजा पर दया करते हैं, देश-काल के विभाग को समझते हैं और सब लोगों को प्रिय लगने वाले वचन बोलते हैं॥21॥
 
Shri Ramchandra ji is engaged in the rituals of Satyadharma, is prosperous, is ready to collect wealth justly and is kind to the people, understands the divisions of time and space and speaks words that are dear to all people. 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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