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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 34: सीताजी का हनुमान् जी के प्रति संदेह और उसका समाधान तथा हनुमान् जी के द्वारा श्रीरामचन्द्रजी के गुणों का गान  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  5.34.30 
रूपवान् सुभग: श्रीमान् कंदर्प इव मूर्तिमान्।
स्थानक्रोधे प्रहर्ता च श्रेष्ठो लोके महारथ:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
वे इतने सुन्दर, सौभाग्यशाली और तेजस्वी हैं, मानो साक्षात् कामदेव हों। वे क्रोधरूपी वाहन पर आक्रमण करने में समर्थ हैं और संसार में सर्वश्रेष्ठ विशेषज्ञ हैं। 30॥
 
He is so handsome, fortunate and radiant, as if he were Kamadeva in person. He is capable of attacking the vessel of anger and is the best expert in the world. 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)