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ramayan 5.34.22: मैं इसे स्वप्न नहीं मानता; क्योंकि स्वप्न में बन्दर को देखकर मनुष्य ऊपर नहीं उठ सकता, जबकि मैं यहाँ ऊपर उठ गया हूँ (उठते समय जो प्रसन्नता होती है, वही प्रसन्नता मेरे मन में व्याप्त है)॥ 22॥   |   ramayan सर्ग 5.34: सीताजी का हनुमान् जी के प्रति संदेह और उसका समाधान तथा हनुमान् जी के द्वारा श्रीरामचन्द्रजी के गुणों का गान   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 34: सीताजी का हनुमान् जी के प्रति संदेह और उसका समाधान तथा हनुमान् जी के द्वारा श्रीरामचन्द्रजी के गुणों का गान  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  5.34.22 
नाहं स्वप्नमिमं मन्ये स्वप्ने दृष्ट्वा हि वानरम्।
न शक्योऽभ्युदय: प्राप्तुं प्राप्तश्चाभ्युदयो मम॥ २२॥
 
 
अनुवाद
मैं इसे स्वप्न नहीं मानता; क्योंकि स्वप्न में बन्दर को देखकर मनुष्य ऊपर नहीं उठ सकता, जबकि मैं यहाँ ऊपर उठ गया हूँ (उठते समय जो प्रसन्नता होती है, वही प्रसन्नता मेरे मन में व्याप्त है)॥ 22॥
 
I do not consider this a dream; because one cannot rise after seeing a monkey in a dream, whereas I have achieved rise here (the same happiness that one feels at the time of rise is prevailing in my mind).॥ 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)