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ramayan 5.34.12: तत्पश्चात् महाबाहु हनुमानजी ने जनकनन्दिनी सीता के चरणों में प्रणाम किया, परन्तु भय के कारण वे उनकी ओर फिर न देख सकीं॥1 2॥   |   ramayan सर्ग 5.34: सीताजी का हनुमान् जी के प्रति संदेह और उसका समाधान तथा हनुमान् जी के द्वारा श्रीरामचन्द्रजी के गुणों का गान   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  5.34.12 
अवन्दत महाबाहुस्ततस्तां जनकात्मजाम्।
सा चैनं भयसंत्रस्ता भूयो नैनमुदैक्षत॥ १२॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् महाबाहु हनुमानजी ने जनकनन्दिनी सीता के चरणों में प्रणाम किया, परन्तु भय के कारण वे उनकी ओर फिर न देख सकीं॥1 2॥
 
After that, the mighty-armed Hanuma bowed at the feet of Janakandini Sita, but due to fear she could not look at him again. 1 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)