Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 ramayan 5.30.39-40: फिर यह कार्य कैसे व्यर्थ न हो जाए, मैं कोई प्रमाद कैसे न करूँ, मेरा समुद्र-पार जाना कैसे व्यर्थ न हो जाए तथा सीताजी मेरी सब बातें सुनकर भी भयभीत न हों - इन सब बातों पर विचार करके बुद्धिमान हनुमान्जी ने यह निश्चय किया॥ 39-40॥ | ramayan सर्ग 5.30: सीताजी से वार्तालाप करने के विषय में हनुमान जी का विचार करना । ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड । श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
न विनश्येत् कथं कार्यं वैक्लव्यं न कथं मम।
लङ्घनं च समुद्रस्य कथं नु न वृथा भवेत्॥ ३९॥
कथं नु खलु वाक्यं मे शृणुयान्नोद्विजेत च।
इति संचिन्त्य हनुमांश्चकार मतिमान् मतिम्॥ ४०॥
अनुवाद
फिर यह कार्य कैसे व्यर्थ न हो जाए, मैं कोई प्रमाद कैसे न करूँ, मेरा समुद्र-पार जाना कैसे व्यर्थ न हो जाए तथा सीताजी मेरी सब बातें सुनकर भी भयभीत न हों - इन सब बातों पर विचार करके बुद्धिमान हनुमान्जी ने यह निश्चय किया॥ 39-40॥
Then how will this task not go wrong, how will I not commit any negligence, how will my crossing of the ocean not go in vain and how will Sitaji hear all my words but not get frightened - after thinking over all these things the wise Hanumanji took this decision.॥ 39-40॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥