Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
ramayan 5.30.38: 'कर्म और अकर्म के विषय में गुरु की निश्चित बुद्धि भी अविवेकी दूत के कारण मूल्यवान नहीं होती; क्योंकि जो दूत अपने को बहुत बुद्धिमान या विद्वान समझते हैं, वे अपनी ही नासमझी के कारण कार्य को बिगाड़ देते हैं॥ 38॥   |   ramayan सर्ग 5.30: सीताजी से वार्तालाप करने के विषय में हनुमान जी का विचार करना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 30: सीताजी से वार्तालाप करने के विषय में हनुमान जी का विचार करना  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  5.30.38 
अर्थानर्थान्तरे बुद्धिर्निश्चितापि न शोभते।
घातयन्ति हि कार्याणि दूता: पण्डितमानिन:॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
'कर्म और अकर्म के विषय में गुरु की निश्चित बुद्धि भी अविवेकी दूत के कारण मूल्यवान नहीं होती; क्योंकि जो दूत अपने को बहुत बुद्धिमान या विद्वान समझते हैं, वे अपनी ही नासमझी के कारण कार्य को बिगाड़ देते हैं॥ 38॥
 
‘Even the master's definite wisdom regarding what is to be done and what is not to be done is not appreciated because of an indiscreet messenger; because messengers who think themselves to be very intelligent or learned, ruin the task due to their own lack of understanding.॥ 38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)