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ramayan 5.30.37: जब किसी अविवेकी या प्रमादी दूत के हाथ में पड़कर, देश-काल के विरुद्ध जाकर, किए हुए कार्य भी असफल हो जाते हैं, जैसे सूर्य के उदय होने पर, चारों ओर फैले हुए अंधकार का निवारण नहीं हो पाता; वह निष्फल हो जाता है ॥37॥   |   ramayan सर्ग 5.30: सीताजी से वार्तालाप करने के विषय में हनुमान जी का विचार करना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 30: सीताजी से वार्तालाप करने के विषय में हनुमान जी का विचार करना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  5.30.37 
भूताश्चार्था विरुध्यन्त देशकालविरोधिता:।
विक्लवं दूतमासाद्य तम: सूर्योदये यथा॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
जब किसी अविवेकी या प्रमादी दूत के हाथ में पड़कर, देश-काल के विरुद्ध जाकर, किए हुए कार्य भी असफल हो जाते हैं, जैसे सूर्य के उदय होने पर, चारों ओर फैले हुए अंधकार का निवारण नहीं हो पाता; वह निष्फल हो जाता है ॥37॥
 
When in the hands of an indiscreet or careless messenger, even the completed works become unsuccessful, going against the time and place, just as when the sun rises, the darkness that spreads all around cannot be controlled; it becomes fruitless. ॥ 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)