श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 30: सीताजी से वार्तालाप करने के विषय में हनुमान जी का विचार करना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  5.30.33 
विमृशंश्च न पश्यामि यो हते मयि वानर:।
शतयोजनविस्तीर्णं लङ्घयेत महोदधिम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
बहुत सोचने के बाद भी मुझे ऐसा कोई वानर नहीं मिला जो मेरे मारे जाने के बाद सौ योजन चौड़े समुद्र को पार कर सके।' 33
 
After much thought, I cannot find any monkey who can cross the ocean which is hundred yojanas wide after I am killed.' 33
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)