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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 30: सीताजी से वार्तालाप करने के विषय में हनुमान जी का विचार करना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  5.30.25 
मम रूपं च सम्प्रेक्ष्य वने विचरतो महत्।
राक्षस्यो भयवित्रस्ता भवेयुर्विकृतस्वरा:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
यहां तक ​​कि वन में विचरण करने वाली राक्षसियां ​​भी मेरा विशाल रूप देखकर भयभीत हो जाएंगी और जोर-जोर से चीखने लगेंगी।
 
Even the demonesses roaming in the forest will get frightened and start screaming loudly upon seeing my huge form.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)