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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 30: सीताजी से वार्तालाप करने के विषय में हनुमान जी का विचार करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.30.17 
अहं ह्यतितनुश्चैव वानरश्च विशेषत:।
वाचं चोदाहरिष्यामि मानुषीमिह संस्कृताम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
'एक तो मेरा शरीर अत्यंत सूक्ष्म है, दूसरे मैं वानर हूँ। विशेषतः, वानर होते हुए भी मैं यहाँ मनुष्यों के समान संस्कृत भाषा में बोलूँगा।॥17॥
 
‘First of all my body is extremely subtle, secondly I am a monkey. In particular, even though I am a monkey I will speak here in human-like Sanskrit language.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)