श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 3: लंकापुरी का अवलोकन करके हनुमान् जी का विस्मित होना, निशाचरी लंका का उन्हें रोकना और उनकी मार से विह्वल होकर प्रवेश की अनुमति देना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  5.3.45 
अहं तु नगरी लंका स्वयमेव प्लवङ्गम।
निर्जिताहं त्वया वीर विक्रमेण महाबल॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
हे महाबली वानर! मैं स्वयं लंका नगरी हूँ; तुमने अपने पराक्रम से मुझे परास्त कर दिया है।
 
O mighty brave monkey! I am the city of Lanka myself; you have defeated me with your valour.
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