श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 3: लंकापुरी का अवलोकन करके हनुमान् जी का विस्मित होना, निशाचरी लंका का उन्हें रोकना और उनकी मार से विह्वल होकर प्रवेश की अनुमति देना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  5.3.33 
द्रक्ष्यामि नगरीं लंकां साट्टप्राकारतोरणाम्।
इत्यर्थमिह सम्प्राप्त: परं कौतूहलं हि मे॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
मैं इस लंका नगरी को, उसके बुर्जों, प्राचीरों और नगरद्वारों सहित देखूँगा। मैं इसी उद्देश्य से यहाँ आया हूँ। मुझे इसे देखने की बहुत उत्सुकता है।
 
I will see this city of Lanka with its towers, ramparts and city gates. I have come here for this very purpose. I am very curious to see it.
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