श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 3: लंकापुरी का अवलोकन करके हनुमान् जी का विस्मित होना, निशाचरी लंका का उन्हें रोकना और उनकी मार से विह्वल होकर प्रवेश की अनुमति देना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  5.3.32 
स तां स्त्रीरूपविकृतां दृष्ट्वा वानरपुङ्गव:।
आबभाषेऽथ मेधावी सत्त्ववान् प्लवगर्षभ:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
लंका को भयंकर राक्षसी रूप में देखकर वानरश्रेष्ठ बुद्धिमान वानरमुख हनुमान्‌जी ने उससे इस प्रकार कहा - 32॥
 
Seeing Lanka in the form of a monstrous demon, the intelligent monkey-headed Hanuman, the best of the monkeys, said to her thus - 32॥
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