श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 3: लंकापुरी का अवलोकन करके हनुमान् जी का विस्मित होना, निशाचरी लंका का उन्हें रोकना और उनकी मार से विह्वल होकर प्रवेश की अनुमति देना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  5.3.31 
लंकाया वचनं श्रुत्वा हनुमान् मारुतात्मज:।
यत्नवान् स हरिश्रेष्ठ: स्थित: शैल इवापर:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
लंका के ये शब्द सुनकर पवनपुत्र और वानरश्रेष्ठ हनुमानजी उसे जीतने के लिए कृतसंकल्प हो गए और वहीं दूसरे पर्वत के समान खड़े हो गए।
 
On hearing these words of Lanka, Hanuman, the son of the wind and the best of the apes, became determined to conquer it and stood there like another mountain.
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