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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 5: सुन्दर काण्ड
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सर्ग 3: लंकापुरी का अवलोकन करके हनुमान् जी का विस्मित होना, निशाचरी लंका का उन्हें रोकना और उनकी मार से विह्वल होकर प्रवेश की अनुमति देना
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श्लोक 27
श्लोक
5.3.27
हनुमद्वचनं श्रुत्वा लंका सा कामरूपिणी।
उवाच वचनं क्रुद्धा परुषं पवनात्मजम्॥ २७॥
अनुवाद
हनुमानजी के ये वचन सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करने वाली लंका क्रोधित हो गई और पवनपुत्र से कठोर शब्दों में बोली-॥27॥
On hearing these words of Hanuman, Lanka, which can assume any form at will, became enraged and spoke to the son of the wind in harsh words -॥ 27॥
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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