श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 3: लंकापुरी का अवलोकन करके हनुमान् जी का विस्मित होना, निशाचरी लंका का उन्हें रोकना और उनकी मार से विह्वल होकर प्रवेश की अनुमति देना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  5.3.11 
क्रौञ्चबर्हिणसंघुष्टै राजहंसनिषेवितै:।
तूर्याभरणनिर्घोषै: सर्वत: परिनादिताम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
वहाँ सारस और मोरों की कलरव ध्वनि गूंजती रहती थी। उन द्वारों पर हंस नामक पक्षी भी निवास करते थे। वहाँ नाना प्रकार के वाद्यों और अलंकारों की मधुर ध्वनि होती थी, जिससे लंकापुरी सब ओर से गूंजती रहती थी॥ 11॥
 
The chirping of cranes and peacocks used to resonate there. The birds called swans also resided at those gates. There used to be sweet sounds of various musical instruments and ornaments, due to which Lankapuri was resonating from all sides.॥ 11॥
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