श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 29: सीताजी के शुभ शकुन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  5.29.1 
तथागतां तां व्यथितामनिन्दितां
व्यतीतहर्षां परिदीनमानसाम्।
शुभां निमित्तानि शुभानि भेजिरे
नरं श्रिया जुष्टमिवोपसेविन:॥ १॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार अशोक वृक्ष से उतरते ही अनेक शुभ शकुन प्रकट हुए और वे व्यथित हृदय वाले, पुण्यात्मा, हर्षहीन, दीनचित्त और शुभ भावना वाले मनुष्य सीताका का सेवन उसी प्रकार करने लगे, जैसे महापुरुष की सेवा करने वाले मनुष्य स्वयं वहाँ पहुँच जाते हैं॥1॥
 
In this way, upon coming down from the Ashoka tree, many auspicious omens appeared and those distressed-hearted, virtuous, joyless, poor-minded and having good intentions started consuming Sitaka in the same way as people who serve a great man themselves reach there. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)