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ramayan 5.27.46: राक्षसो! जननन्दिनी मिथिलेशकुमारी सीता को नमस्कार करने मात्र से ही वे प्रसन्न हो जाएँगी। केवल वे ही उस महान भय से तुम्हारी रक्षा करने में समर्थ हैं। 46॥   |   ramayan सर्ग 5.27: त्रिजटा का स्वप्न, राक्षसों के विनाश और श्रीरघुनाथजी की विजय की शुभ सूचना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  5.27.46 
प्रणिपातप्रसन्ना हि मैथिली जनकात्मजा।
अलमेषा परित्रातुं राक्षस्यो महतो भयात्॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
राक्षसो! जननन्दिनी मिथिलेशकुमारी सीता को नमस्कार करने मात्र से ही वे प्रसन्न हो जाएँगी। केवल वे ही उस महान भय से तुम्हारी रक्षा करने में समर्थ हैं। 46॥
 
Demons! Jananandini Mithilesh Kumari Sita will become happy just by paying obeisance to her. Only they are capable of protecting you from that great fear. 46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)