श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 27: त्रिजटा का स्वप्न, राक्षसों के विनाश और श्रीरघुनाथजी की विजय की शुभ सूचना  »  श्लोक 14-15h
 
 
श्लोक  5.27.14-15h 
ततस्तस्य नगस्याग्रे ह्याकाशस्थस्य दन्तिन:॥ १४॥
भर्त्रा परिगृहीतस्य जानकी स्कन्धमाश्रिता।
 
 
अनुवाद
'तब आकाश में उस पर्वत शिखर पर खड़ी हुई जानकी भी अपने पति के द्वारा पकड़े हुए उस हाथी के कंधे पर सवार होकर आ पहुँचीं॥14 1/2॥
 
‘Then standing on that mountain peak in the sky, Janaki also arrived on the shoulder of that elephant held by her husband.॥ 14 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)