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ramayan 5.26.8: ‘मैं उस निशाचर रावण को, जिसकी लोग निंदा करते हैं, अपने बाएँ पैर से भी नहीं छू सकता, फिर उससे प्रेम करने का क्या प्रयोजन है?॥8॥   |   ramayan सर्ग 5.26: सीता का करुण-विलाप तथा अपने प्राणों को त्याग देने का निश्चय करना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 26: सीता का करुण-विलाप तथा अपने प्राणों को त्याग देने का निश्चय करना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  5.26.8 
चरणेनापि सव्येन न स्पृशेयं निशाचरम्।
रावणं किं पुनरहं कामयेयं विगर्हितम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
‘मैं उस निशाचर रावण को, जिसकी लोग निंदा करते हैं, अपने बाएँ पैर से भी नहीं छू सकता, फिर उससे प्रेम करने का क्या प्रयोजन है?॥8॥
 
‘I cannot even touch that night-monger Ravana, who is condemned by the people, with my left foot, then what is the point of loving him?॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)