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ramayan 5.26.48: मैं उन महात्माओं को नमस्कार करता हूँ जिन्हें प्रिय के वियोग में दुःख नहीं होता और जिन्हें अप्रिय के सम्पर्क में आने पर और भी अधिक दुःख नहीं होता - जो प्रिय और अप्रिय दोनों से परे हैं ॥48॥   |   ramayan सर्ग 5.26: सीता का करुण-विलाप तथा अपने प्राणों को त्याग देने का निश्चय करना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 26: सीता का करुण-विलाप तथा अपने प्राणों को त्याग देने का निश्चय करना  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  5.26.48 
प्रियान्न सम्भवेद् दु:खमप्रियादधिकं भवेत्।
ताभ्यां हि ते वियुज्यन्ते नमस्तेषां महात्मनाम्॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
मैं उन महात्माओं को नमस्कार करता हूँ जिन्हें प्रिय के वियोग में दुःख नहीं होता और जिन्हें अप्रिय के सम्पर्क में आने पर और भी अधिक दुःख नहीं होता - जो प्रिय और अप्रिय दोनों से परे हैं ॥48॥
 
I salute those great souls who do not feel pain on separation from the beloved and who do not feel even more pain on being in contact with the unpleasant - who are beyond both the pleasant and the unpleasant. ॥ 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)