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ramayan 5.26.47: वे महात्मा और मुनिगण धन्य हैं जो भगवान् के सच्चे स्वरूप को अपनी आत्मा मानते हैं और जो अपने अन्तःकरण को वश में रखते हैं; उन्हें न तो कोई प्रिय है और न ही कोई अप्रिय ॥47॥   |   ramayan सर्ग 5.26: सीता का करुण-विलाप तथा अपने प्राणों को त्याग देने का निश्चय करना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 26: सीता का करुण-विलाप तथा अपने प्राणों को त्याग देने का निश्चय करना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  5.26.47 
धन्या: खलु महात्मानो मुनय: सत्यसम्मता:।
जितात्मानो महाभागा येषां न स्त: प्रियाप्रिये॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
वे महात्मा और मुनिगण धन्य हैं जो भगवान् के सच्चे स्वरूप को अपनी आत्मा मानते हैं और जो अपने अन्तःकरण को वश में रखते हैं; उन्हें न तो कोई प्रिय है और न ही कोई अप्रिय ॥47॥
 
Blessed are those great saints and sages who consider the true form of God as their own soul and who have control over their conscience; they have no one dear or disliked. ॥ 47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)