श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 24: सीताजी का राक्षसियों की बात मानने से इनकार कर देना तथा राक्षसियों का उन्हें मारने-काट ने की धमकी देना  »  श्लोक 30-31
 
 
श्लोक  5.24.30-31 
न च न: कुरुषे वाक्यं हितं कालपुरस्कृतम्।
आनीतासि समुद्रस्य पारमन्यैर्दुरासदम्॥ ३०॥
रावणान्त:पुरे घोरे प्रविष्टा चासि मैथिलि।
रावणस्य गृहे रुद्धा अस्माभिस्त्वभिरक्षिता॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
इतना सब होने पर भी तुम हमारी बात नहीं सुनतीं। हमने तुम्हारे हित में समय रहते सलाह दे दी थी। देखो, तुम्हें समुद्र के उस पार लाया गया है, जहाँ दूसरों का पहुँचना बहुत कठिन है। यहाँ भी तुम्हें रावण के भयानक हरम में रखा गया है। मिथिलेश कुमारी! याद रखो, तुम रावण के घर में कैद हो और हम जैसी राक्षसियाँ तुम पर नज़र रख रही हैं।
 
‘Despite all this you do not listen to us. We had given timely advice for your benefit. Look, you have been brought to this side of the ocean, where it is very difficult for others to reach. Here also you have been kept in the terrifying harem of Ravana. Mithilesh Kumari! Remember, you are imprisoned in Ravana's house and demonesses like us are keeping a watch on you.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)