श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 21: सीताजी का रावण को समझाना और उसे श्रीराम के सामने नगण्य बताना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  5.21.8 
आत्मानमुपमां कृत्वा स्वेषु दारेषु रम्यताम्।
अतुष्टं स्वेषु दारेषु चपलं चपलेन्द्रियम्।
नयन्ति निकृतिप्रज्ञं परदारा: पराभवम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
‘अपने को आदर्श बनाओ और अपनी ही स्त्रियों में आसक्त रहो। जो चंचल इन्द्रियाँ हैं, जो अपनी स्त्रियों से संतुष्ट नहीं हैं और जिसकी बुद्धि निन्दनीय है, उस चंचल पुरुष को पराई स्त्री गिरा देती है – वह उसे कलंकित कर देती है॥8॥
 
‘Make yourself an ideal and remain attached to your own women. The woman of others brings down that fickle man with restless senses, who is not satisfied with his own wives and whose intellect is reproachable – she puts him in disgrace.॥ 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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