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श्लोक 5.21.3  |
तृणमन्तरत: कृत्वा प्रत्युवाच शुचिस्मिता।
निवर्तय मनो मत्त: स्वजने प्रीयतां मन:॥ ३॥ |
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| अनुवाद |
| विदेहनन्दिनी ने शुद्ध मुस्कान के साथ तिनके के पीछे से रावण को उत्तर दिया - 'मुझसे अपना मन हटाकर अपनी बन्धु-बान्धवों (अपनी पत्नियों) से प्रेम करो।॥3॥ |
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| Videhanandini with a pure smile replied to Ravana from behind a straw - 'Turn your mind away from me and love your own close ones (your own wives).॥ 3॥ |
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