श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 21: सीताजी का रावण को समझाना और उसे श्रीराम के सामने नगण्य बताना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.21.2 
दु:खार्ता रुदती सीता वेपमाना तपस्विनी।
चिन्तयन्ती वरारोहा पतिमेव पतिव्रता॥ २॥
 
 
अनुवाद
उस समय सुन्दर शरीर वाली, पतिव्रता और तपस्वी देवी सीता काँप रही थीं और वेदना से रो रही थीं तथा अपने पति का स्मरण कर रही थीं॥ 2॥
 
At that time, Sita, the beautiful bodied, devoted and ascetic goddess, was trembling and crying in agony and was thinking of her husband.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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