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श्लोक 5.21.16  |
उपधाय भुजं तस्य लोकनाथस्य सत्कृतम्।
कथं नामोपधास्यामि भुजमन्यस्य कस्यचित्॥ १६॥ |
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| अनुवाद |
| ‘जगदीश्वर श्री रामचन्द्रजी की पूज्य भुजा पर सिर रखकर अब मैं दूसरे की भुजा को तकिया कैसे बना सकता हूँ?॥16॥ |
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| ‘Having rested my head on the revered arm of Jagadishwar Sri Ramachandraji, how can I now use someone else’s arm as a pillow?॥ 16॥ |
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