श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 21: सीताजी का रावण को समझाना और उसे श्रीराम के सामने नगण्य बताना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  5.21.16 
उपधाय भुजं तस्य लोकनाथस्य सत्कृतम्।
कथं नामोपधास्यामि भुजमन्यस्य कस्यचित्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
‘जगदीश्वर श्री रामचन्द्रजी की पूज्य भुजा पर सिर रखकर अब मैं दूसरे की भुजा को तकिया कैसे बना सकता हूँ?॥16॥
 
‘Having rested my head on the revered arm of Jagadishwar Sri Ramachandraji, how can I now use someone else’s arm as a pillow?॥ 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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