श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 21: सीताजी का रावण को समझाना और उसे श्रीराम के सामने नगण्य बताना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  5.21.15 
शक्या लोभयितुं नाहमैश्वर्येण धनेन वा।
अनन्या राघवेणाहं भास्करेण यथा प्रभा॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जैसे तेज सूर्य से अभिन्न है, वैसे ही मैं श्री रघुनाथजी से अभिन्न हूँ। तुम मुझे ऐश्वर्य या धन से मोहित नहीं कर सकते॥15॥
 
‘Just as the radiance is inseparable from the Sun, similarly I am inseparable from Shri Raghunathji. You cannot entice me with opulence or wealth.॥ 15॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas