श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 21: सीताजी का रावण को समझाना और उसे श्रीराम के सामने नगण्य बताना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  5.21.10 
वचो मिथ्याप्रणीतात्मा पथ्यमुक्तं विचक्षणै:।
राक्षसानामभावाय त्वं वा न प्रतिपद्यसे॥ १०॥
 
 
अनुवाद
क्या तुम अपने कल्याण के लिए बुद्धिमान पुरुषों द्वारा दी गई सलाह को व्यर्थ समझकर स्वीकार नहीं करते, क्योंकि तुम राक्षसों का नाश करने पर तुले हुए हो?॥10॥
 
‘Or do you not accept the advice given by wise men for your welfare, considering it worthless because you are hell-bent on destroying the demons?॥ 10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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