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श्लोक 5.20.4  |
नेह किञ्चिन्मनुष्या वा राक्षसा: कामरूपिण:।
व्यपसर्पतु ते सीते भयं मत्त: समुत्थितम्॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| यहाँ तुम्हें किसी प्रकार का भय नहीं है। न तो मनुष्य आ सकते हैं और न ही इच्छानुसार कोई अन्य रूप धारण करने वाले राक्षस, केवल मैं ही आ सकता हूँ। परन्तु सीता! तुम्हें मुझसे जो भय है, वह दूर हो जाना चाहिए।॥4॥ |
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| ‘There is no fear for you here. Neither humans nor other demons who can take any form at will can come to this place, only I can come. But Sita! The fear you are having of me must go away. ॥ 4॥ |
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