श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 2: लंकापुरी का वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमान जी का विचार, उनका लघुरूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  5.2.57 
चन्द्रोऽपि साचिव्यमिवास्य कुर्वं-
स्तारागणैर्मध्यगतो विराजन्।
ज्योत्स्नावितानेन वितत्य लोका-
नुत्तिष्ठतेऽनेकसहस्ररश्मि:॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
उस समय तारों के साथ-साथ उनके बीच में बैठे हुए सहस्त्र किरणों वाले चन्द्रदेव भी हनुमान की सहायता करते हुए, समस्त लोकों पर छत्र के समान अपनी चन्द्रमा की ज्योति फैलाते हुए, उदय हुए।
 
At that time, along with the stars, the Moon God with thousands of rays, sitting amidst them, also rose, as if helping Hanuman, spreading his moonlight like a canopy over all the worlds.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)