श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 2: लंकापुरी का वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमान जी का विचार, उनका लघुरूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  5.2.55 
अचिन्त्यामद्भुताकारां दृष्ट्वा लंकां महाकपि:।
आसीद् विषण्णो हृष्टश्च वैदेह्या दर्शनोत्सुक:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
ऐसी अकल्पनीय और अद्भुत आकार वाली लंका को देखकर महाकपि हनुमानजी दुःखी हो गए; तथापि वे जानकीजी के दर्शन के लिए बहुत उत्सुक थे, इसलिए उनका हर्ष और उत्साह कम नहीं हुआ ॥ 55॥
 
Seeing Lanka of such unimaginable and wonderful size, the great ape Hanuman became sad; however, he was very eager to see Janaki, so his joy and enthusiasm did not wane. ॥ 55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)