श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 2: लंकापुरी का वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमान जी का विचार, उनका लघुरूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  5.2.54 
काञ्चनानि विचित्राणि तोरणानि च रक्षसाम्।
लंकामुद्योतयामासु: सर्वत: समलंकृताम्॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
चारों ओर से सुसज्जित सोने के बने विचित्र द्वार राक्षसों की लंका में और भी रोमांच बढ़ा रहे थे।
 
Strange gates made of gold were adding further excitement to Lanka of the demons decorated on all sides. 54.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)