श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 2: लंकापुरी का वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमान जी का विचार, उनका लघुरूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  5.2.51 
प्रासादमालाविततां स्तम्भै: काञ्चनसंनिभै:।
शातकुम्भनिभैर्जालैर्गन्धर्वनगरोपमाम्॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
उसमें महलों की लम्बी-लम्बी कतारें फैली हुई थीं। स्वर्ण-स्तंभों और स्वर्ण-जालियों से सुशोभित वह नगर गंधर्व नगर के समान सुन्दर प्रतीत हो रहा था।
 
Long rows of palaces were spread out in it. That city, decorated with golden pillars and golden lattices, appeared as beautiful as the Gandharva city. 51.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)