श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 2: लंकापुरी का वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमान जी का विचार, उनका लघुरूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  5.2.41 
न विनश्येत् कथं कार्यं वैक्लव्यं न कथं भवेत्।
लङ्घनं च समुद्रस्य कथं नु न भवेद् वृथा॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
अच्छा, मैं कौन-सा उपाय अपनाऊँ जिससे मेरे स्वामी का कार्य नष्ट न हो, मैं घबराऊँ नहीं, मेरी अचेतनता नष्ट न हो और मेरा यह सागर पार करना व्यर्थ न हो?’ 41.
 
Well, which method should I adopt that will not ruin my master's work, will not cause me to panic or lose my senses and my crossing of this ocean will not go in vain?' 41.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)