श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 2: लंकापुरी का वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमान जी का विचार, उनका लघुरूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  5.2.39 
भूताश्चार्था विनश्यन्ति देशकालविरोधिता:।
विक्लवं दूतमासाद्य तम: सूर्योदये यथा॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
अनेक बार तो बना हुआ कार्य भी देश और काल के विरोधाभास के कारण कायर या मूर्ख दूत के हाथ में पड़कर वैसे ही बिगड़ जाता है, जैसे सूर्योदय होने पर अंधकार नष्ट हो जाता है॥39॥
 
‘Many a times, even the work which has already been completed gets spoilt because of the contradictions in place and time when it falls into the hands of a coward or an unwise messenger, just as darkness vanishes when the sun rises.॥ 39॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)