श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 2: लंकापुरी का वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमान जी का विचार, उनका लघुरूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  5.2.38 
न विनश्येत् कथं कार्यं रामस्य विदितात्मन:।
एकामेकस्तु पश्येयं रहिते जनकात्मजाम्॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
ऐसा किस प्रकार किया जाए कि विश्वविख्यात श्री रामजी के कार्य में बाधा न आए और मैं एकान्त में जानकीजी से भी मिल सकूँ?
 
In what way should this be done so that the work of the world-renowned Sri Rama is not hampered and I can also meet Janaki in solitude?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)