श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 2: लंकापुरी का वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमान जी का विचार, उनका लघुरूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  5.2.33 
अनेन रूपेण मया न शक्या रक्षसां पुरी।
प्रवेष्टुं राक्षसैर्गुप्ता क्रूरैर्बलसमन्वितै:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
उसने सोचा, 'मैं इस रूप में राक्षसों के इस नगर में प्रवेश नहीं कर सकता, क्योंकि अनेक क्रूर और शक्तिशाली राक्षस इसकी रक्षा कर रहे हैं।
 
He thought, 'I cannot enter this city of demons in this form because many cruel and powerful demons are protecting it.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)