श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 2: लंकापुरी का वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमान जी का विचार, उनका लघुरूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.2.3 
योजनानां शतं श्रीमांस्तीर्त्वाप्युत्तमविक्रम:।
अनि:श्वसन् कपिस्तत्र न ग्लानिमधिगच्छति॥ ३॥
 
 
अनुवाद
सौ योजन समुद्र पार करने पर भी महाबली हनुमानजी न तो लम्बी साँस ले रहे थे और न ही उन्हें कोई पश्चाताप हो रहा था॥3॥
 
Even after crossing a hundred yojanas of the sea, the mighty and valiant Hanuman was not taking long breaths and did not feel any remorse. ॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)