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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 5: सुन्दर काण्ड
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सर्ग 2: लंकापुरी का वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमान जी का विचार, उनका लघुरूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन
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श्लोक 27
श्लोक
5.2.27
आगत्यापीह हरयो भविष्यन्ति निरर्थका:।
नहि युद्धेन वै लंका शक्या जेतुं सुरैरपि॥ २७॥
अनुवाद
‘यदि वानर भी यहाँ तक आएँ, तो भी व्यर्थ होगा; क्योंकि देवता भी युद्ध द्वारा लंका को नहीं जीत सकते।॥27॥
‘Even if the monkeys come this far, it will be in vain; because even the gods cannot conquer Lanka through war.॥ 27॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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