vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
»
काण्ड 5: सुन्दर काण्ड
»
सर्ग 2: लंकापुरी का वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमान जी का विचार, उनका लघुरूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन
»
श्लोक 26
श्लोक
5.2.26
तस्याश्च महतीं गुप्तिं सागरं च निरीक्ष्य स:।
रावणं च रिपुं घोरं चिन्तयामास वानर:॥ २६॥
अनुवाद
उस नगर में भारी सुरक्षा, चारों ओर समुद्र की खाइयाँ और रावण जैसे भयंकर शत्रु को देखकर हनुमानजी इस प्रकार विचार करने लगे-॥26॥
Seeing the heavy security in that city, the sea-ditch all around it, and a fearsome enemy like Ravana, Hanumanji began to think thus -॥ 26॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×