श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 2: लंकापुरी का वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमान जी का विचार, उनका लघुरूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन  »  श्लोक 21-22h
 
 
श्लोक  5.2.21-22h 
वप्रप्राकारजघनां विपुलाम्बुवनाम्बराम्।
शतघ्नीशूलकेशान्तामट्टालकावतंसकाम्॥ २१॥
मनसेव कृतां लंकां निर्मितां विश्वकर्मणा।
 
 
अनुवाद
विश्वकर्मा द्वारा निर्मित लंका उनके मन के संकल्प से निर्मित एक सुन्दरी के समान थी। उसकी चारदीवारी और भीतर की वेदी उसके जघन-प्रदेश के समान प्रतीत होती थी, समुद्र और वन का विशाल जल उसके वस्त्र थे, शतघ्नी और शूल नामक अस्त्र उसके केश थे और विशाल भवन उसके कानों के आभूषण के समान प्रतीत होते थे।
 
Lanka built by Vishwakarma was like a beautiful woman created by his mental resolve. The boundary walls and the altar inside it seemed like her pubic area, the vast water of the ocean and the forest were her clothes, the weapons called Shataghni and Shoola were her hair and the huge mansions seemed like ear ornaments for her.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)