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श्लोक  5.17.31 
हर्षजानि च सोऽश्रूणि तां दृष्ट्वा मदिरेक्षणाम्।
मुमोच हनुमांस्तत्र नमश्चक्रे च राघवम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
वहाँ सुन्दर नेत्रों वाली सीता को देखकर हनुमानजी प्रसन्नता के आँसू बहाने लगे और मन ही मन श्री रघुनाथजी को प्रणाम किया।
 
Seeing Sita with beautiful eyes there, Hanuman started shedding tears of joy. He silently saluted Shri Raghunath.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)