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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 17: भयंकर राक्षसियों से घिरी हुई सीता के दर्शन से हनुमान जी का प्रसन्न होना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  5.17.25 
ददर्श हनुमांस्तत्र लतामकुसुमामिव।
सा मलेन च दिग्धांगी वपुषा चाप्यलंकृता।
मृणाली पङ्कदिग्धेव विभाति च न भाति च॥ २५॥
 
 
अनुवाद
उसके शरीर के सभी अंगों पर मैल जम गया था। उसकी एकमात्र शोभा उसकी शारीरिक सुन्दरता ही थी। कीचड़ से सने कमल के डंठल के समान वह सुन्दरता और कुरूपता दोनों ही दिखायी दे रही थी॥ 25॥
 
Dirt had settled on all her body parts. Her only adornment was her physical beauty. Like a lotus stalk covered in mud, she was appearing both beautiful and ugliness.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)