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ramayan 5.16.30: जैसे हिम से आहत कमल पुष्प की शोभा नष्ट हो गई है, वैसे ही वह दुःख पर दुःख सहते हुए अत्यन्त दुःखी हो गई है और जैसे अपने साथी से बिछुड़ी हुई चकवी (पक्षी) अपने पति के वियोग का दुःख सहती हुई अत्यन्त दयनीय अवस्था को पहुँच गई है, वैसे ही यह जनकपुत्री सीता भी अत्यन्त दयनीय अवस्था को प्राप्त हो गई है॥30॥   |   ramayan सर्ग 5.16: हनुमान जी का मन-ही-मन सीताजी के शील और सौन्दर्य की सराहना करते हुए उन्हें कष्ट में पड़ी देख स्वयं भी उनके लिये शोक करना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 16: हनुमान जी का मन-ही-मन सीताजी के शील और सौन्दर्य की सराहना करते हुए उन्हें कष्ट में पड़ी देख स्वयं भी उनके लिये शोक करना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  5.16.30 
हिमहतनलिनीव नष्टशोभा
व्यसनपरम्परया निपीडॺमाना।
सहचररहितेव चक्रवाकी
जनकसुता कृपणां दशां प्रपन्ना॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
जैसे हिम से आहत कमल पुष्प की शोभा नष्ट हो गई है, वैसे ही वह दुःख पर दुःख सहते हुए अत्यन्त दुःखी हो गई है और जैसे अपने साथी से बिछुड़ी हुई चकवी (पक्षी) अपने पति के वियोग का दुःख सहती हुई अत्यन्त दयनीय अवस्था को पहुँच गई है, वैसे ही यह जनकपुत्री सीता भी अत्यन्त दयनीय अवस्था को प्राप्त हो गई है॥30॥
 
Like a lotus flower struck by snow, her beauty has been destroyed, she is extremely pained by bearing misery after misery and like a Chakvi (bird) separated from its companion, enduring the pain of separation from her husband, this daughter of Janak, Sita, has reached a very pitiable state.॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)