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ramayan 5.16.1: परम आदरणीय सीताजी और मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की प्रशंसा करके वानरश्रेष्ठ हनुमानजी पुनः विचार करने लगे।   |   ramayan सर्ग 5.16: हनुमान जी का मन-ही-मन सीताजी के शील और सौन्दर्य की सराहना करते हुए उन्हें कष्ट में पड़ी देख स्वयं भी उनके लिये शोक करना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  5.16.1 
प्रशस्य तु प्रशस्तव्यां सीतां तां हरिपुंगव:।
गुणाभिरामं रामं च पुनश्चिन्तापरोऽभवत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
परम आदरणीय सीताजी और मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की प्रशंसा करके वानरश्रेष्ठ हनुमानजी पुनः विचार करने लगे।
 
After praising the most admirable Sita and the virtuous Shri Ram, the best of monkeys Hanuman ji started thinking again.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)