श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 15: वन की शोभा देखते हुए हनुमान जी का एक चैत्यप्रासाद (मन्दिर) के पास सीता को दयनीय अवस्था में देखना, पहचानना और प्रसन्न होना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  5.15.41 
वैदेह्या यानि चांगेषु तदा रामोऽन्वकीर्तयत्।
तान्याभरणजालानि गात्रशोभीन्यलक्षयत्॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
श्री रामचन्द्रजी ने विदेहकुमारी के शरीर पर जिन आभूषणों के होने का उल्लेख किया था, वे अब उसके शरीर की शोभा बढ़ा रहे थे। हनुमानजी ने यह देख लिया॥ 41॥
 
Those ornaments which Shri Ramchandraji had mentioned about the presence of on the body of Videha Kumari were now enhancing the beauty of her body. Hanumanji noticed this.॥ 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)