श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 15: वन की शोभा देखते हुए हनुमान जी का एक चैत्यप्रासाद (मन्दिर) के पास सीता को दयनीय अवस्था में देखना, पहचानना और प्रसन्न होना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  5.15.35 
रामोपरोधव्यथितां रक्षोगणनिपीडिताम्।
अबलां मृगशावाक्षीं वीक्षमाणां ततस्तत:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
श्री राम की सेवा में विघ्न पड़ने से उनके हृदय में बड़ी पीड़ा हुई। हिरण के बच्चे के समान नेत्रों वाली तथा राक्षसों से पीड़ित, असहाय सीता असहाय होकर इधर-उधर देख रही थीं।
 
The interruption in the service of Shri Rama caused great anguish in her heart. The helpless Sita, who had the eyes of a deer-cub and was afflicted by the demons, was looking here and there helplessly.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)