श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 15: वन की शोभा देखते हुए हनुमान जी का एक चैत्यप्रासाद (मन्दिर) के पास सीता को दयनीय अवस्था में देखना, पहचानना और प्रसन्न होना  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  5.15.18-19 
ततो मलिनसंवीतां राक्षसीभि: समावृताम्॥ १८॥
उपवासकृशां दीनां नि:श्वसन्तीं पुन: पुन:।
ददर्श शुक्लपक्षादौ चन्द्ररेखामिवामलाम्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
चैत्यप्रासाद (मंदिर) को देखकर उनकी दृष्टि वहाँ मैले वस्त्र पहने राक्षसियों से घिरी हुई एक सुन्दर स्त्री पर पड़ी। वह व्रत के कारण अत्यन्त दुर्बल और दीन-हीन दिखाई दे रही थी और बार-बार रो रही थी। वह शुक्ल पक्ष के प्रारम्भ में चन्द्रमा की कला के समान निर्मल और सुडौल दिखाई दे रही थी।॥18-19॥
 
After seeing the Chaityaprasad (temple), his eyes fell on a beautiful woman sitting there surrounded by demonesses wearing dirty clothes. She looked very weak and miserable due to fasting and was repeatedly weeping. She appeared as pure and slender as the phase of the moon appears at the beginning of the Shukla paksha.॥18-19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)